भाग 2

शतरंज के खिलाड़ी

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राज्य में हाहाकार मचा हुआ था। प्रजा दिन-दहाड़े लूटी जाती थी। कोई फ़रियाद सुननेवाला न था। देहातों की सारी दौलत लखनऊ में खिंची चली आती थी, और वह वेश्याओं में, भाँड़ों में और विला-सिता के अन्य अगों की पूर्ति में उड़ जाती थी। अँगरेज कंपनी का ऋण दिन-दिन बढ़ता जाता था। कमली दिन-दिन भीगकर भारी होती जाती थी। देश में सुव्यवस्था न होने के कारण वार्षिक कर भी न वसूल होता था। रेजीडेंट बार-बार चेतावनी देता था; पर यहाँ तो लोग विलासिता के नशे में चूर थे; किसी के कानों पर जूं न रेंगती थी।

खैर, मीर साहब के दीवानखाने में शतरंज होते कई महीने गुज गये। नये-नये नक्शे हल किये जाते; नये-नये किले बनाये जाते; नित. नयी ब्यूह-रचना होती; कभी-कभी खेलते-खेलते झौड़ हो जाती; तू-तू मैं-मैं तक की नौबत आ जाती। पर शीघ्र ही दोनों मित्रों में मेल हो जाता। कभी-कभी ऐसा भी होता कि बाजी उठा दी जाती; मिर्जाजी रूठकर अपने घर चले आते; मीर साहब अपने घर में जा बैठते। पर रात भर की निद्रा के साथ सारा मनोमालिन्य शान्त हो जाता था। प्रातःकाल दोनों मित्र दीवानख़ाने में आ पहुँचते थे।

एक दिन दोनों मित्र बैठे शतरंज की दलदल में गोते खा रहे थे कि.इतने में घोड़े पर सवार एक बादशाही फौज का अफसर मीर साहब का नाम् पूछता हुआ था पहुँचा। मोर साहब के होश उड़ गये। यह क्या बला सिर पर आयी! यह तलबी किस लिए हुई। अब खैरियत नहीं नज़र आती! भार के दरवाजे बन्द कर लिये। नौकरों से बोले- कह दो, घर में नहीं हैं। ​सवार––घर में नहीं, तो कहाँ हैं?

सवार––काम तुझे क्या बतलाऊॅ? हुजूर में तलबी है––शायद फ़ौज के लिए कुछ सिपाही माँगे गये हैं। जागीरदार हैं कि दिल्लगी! मोरचे पर जाना पड़ेगा, तो आटे-दाल का भाव मालूम हो जायगा!

सवार––कहने की बात नहीं है। मैं कल खुद आऊँगा। साथ ले जाने का हुक्म हुआ है।

सवार चला गया। मीर साहब की आत्मा काँप उठी। मिर्जाजी से बोले––कहिए जनाब, अब क्या होगा?

मिर्जा––बड़ी मुसीबत है। कहीं मेरी भी तलबी न हो।

मिर्जा––आफत है, और क्या! कहीं मोरचे पर जाना पड़ा, तो बेमौत मरे।

मीर––बस, यही एक तदबीर है कि घर पर मिलो ही नहीं। कल से गोमती पर कहीं वीराने में नक्शा जमे। वहाँ किसे खबर होगी? हजरत आकर आप लौट जायँगे।

मिर्जा––वल्लाह, आपको खूब सूझी! इसके सिवा और कोई तदबीर नहीं हैं।

इधर मीर साहब की बेगम उस सवार से कह रही थीं––तुमने खूब धता बतायी। उसने जवाब दिया––ऐसे गावदियों को तो चुटकियों पर नचाता हूँ। इनकी सारी अक्ल और हिम्मत तो शतरंज ने चर ली। अब भूलकर भी घर पर न रहेंगे।

दूसरे दिन दोनों मित्र मुँह अंधेरै घर से निकल खड़े होते। बगल ​में एक छोटी-सी दरो दबाये, डिब्बे में गिलौरियाँ भरे गोमती पारकर एक पुरानी वीरान मसजिद में चले जाते, जिसे शायद नवाब आसफउद्दौला ने बनवाया था। रास्ते में तम्बाकू, चिलम और मदरिया ले लेते, और मसजिद में पहुँच, दरी बिछा, हुक्का भरकर शतरंज खेलने बैठ जाते थे। फिर उन्हें दीन-दुनिया की फिक्र न रहती थी। 'किश्त', 'शह' आदि दो-एक शब्दों के सिवा उनके मुँह से और कोई वाक्य नहीं निकलता था। कोई योगी भी समाधि में इतना एकाग्र न होता होगा। दोपहर को जब भूख मालूम होती, तो दोनों मित्र किसी नानबाई की दुकान पर जाकर खाना खा आते, और एक चिलम हुक्का पीकर फिर संग्रामक्षेत्र में डट जाते। कभी-कभी तो उन्हें भोजन का भी खयाल न रहता था।

इधर देश की राजनीतिक दशा भयंकर होती जा रही थी। कम्पनी की फ़ौजै लखनऊ की तरफ बढ़ी चली आती थीं। शहर में हलचल मची हुई थी। लोग बाल-बच्चों को ले-लेकर देहातों में भाग रहे थे। पर हमारे दोनों खिलाड़ियों को इसकी जरा भी फिक्र न थी। वे घर से आते, तो गलिया में होकर। डर था कि कहीं किसी बादशाही मुलाजिम की निगाह न पड़ जाय, तो बेगार में पकड़ जायँ। हजारों रुपए सालाना की जागीर मुफ्त ही में हजम करना चाहते थे।

एक दिन दोनों मित्र मसजिद के खँडहर में बैठे हुए शतरंज खेल रहे थे। मिर्जा की बाजी कुछ कमजोर थी। मीर साहब उन्हें किश्त-पर-किश्त दे रहे थे। इतने में कम्पनी के सैनिक आते हुए दिखायी दिये। यह गोरों की फौज थी, जो लखनऊ पर अधिकार जमाने के लिए आ रही थी।

मीर साहब बोले––अँगरेजी फौज आ रही है। खुदा खैर करे।

मिर्जा––आने दीजिए, किश्त बचाइए। लो यह किश्त।

मीर––ज़रा देखना चाहिए––यहीं आड़ में खड़े हो जायँ।

मिर्जा––देख लीजिएगा, जल्दी क्या है, फिर किश्त।। ​मीर––तोपखाना भी है। कोई पाँच हजार आदमी होंगे। कैसे जवान हैं। लाल बंदरों के-से-मुँह हैं। सूरत देखकर खौफ मालूम होता है।

मिर्जा––जनाब, हीले न कीजिए। ये चकमे किसी और को दीजिएगा यह किश्त!

मीर––आप भी अजीब आदमी हैं। यहाँ तो शहर पर आफत आयी हुई है, और आपको किश्त की सूझी है! कुछ इसकी भी खबर है कि शहर घिर गया, तो घर कैसे चलेंगे?

मिर्जा––जब घर चलने का वक्त आयेगा, तो देखी जायगी––बह किश्त! बस अबकी शह में मात है।

फौज निकल गयी। दस बजे का समय था। फिर बाजी बिछ गयी।

मीर––अजी, आज तो रोजा है। क्या आपको भूख ज्यादा मालूम होती है?

मिर्जा––जी नहीं। शहर में न जाने क्या हो रहा है।

मीर––शहर में कुछ न हो रहा होगा। लोग खाना खा-खाकर आराम से सो रहे होंगे। हुजूर नवाब साहब भी ऐशगाह में होंगे।

दोनों सज्जन फिर जो खेलने बैठे तो तीन बज गये। अबकी मिर्जाजी की बाजी कमजोर थी। चार का गजर बज ही रहा था कि फौज की वापसी की आहट मिली। नवाब वाजिदअली शाह पकड़ लिये गये थे, और सेना उन्हें किसी अज्ञात स्थान को लिये जा रही थी। शहर में न कोई हलचल थी, न मार-काट। एक बूंद भी खून नहीं गिरा था। आज तक किसी स्वाधीन देश के राजा को पराजय इतनी शांति से, इस तरह खून बहे बिना न हुई होगी। यह वह अहिंसा न थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होते हैं। यह वह कायरपन था, जिस पर बड़े-से-बड़े कायर भी आँसू बहाते हैं। अवध के विशाल देश का नावाब बन्दी बना चला जाता था, और लखनऊ ​ऐश की नींद में मस्त था। यह राजनीतिक अधःपतन की चरम सीमा थी।

मिर्जा ने कहा––हुजूर नवाब, साहब को ज़ालिमो ने क़ैद कर लिया है।

मिर्जा––जनाब जरा ठहरिए। इस वक्त इधर तबीअत नहीं लगती। बेचारे नवाब साहब इस वक्त खून के आँसू रो रहे होंगे।

मीर––रोया ही चाहें, यह ऐश वहाँ कहाँ नसीब होगा––यह किश्त!

मिर्जा––किसी के दिन बराबर नहीं जाते। कितनी दर्द़नाक हालत है।

मीर––हाँ, सो तो है ही––यह लो, फिर किश्त! बस, अबकी किश्त में मात है। बच नहीं सकते।

मिर्जा––खुदा की क़सम आप बड़े बेदर्द हैं। इतना बड़ा हादसा देखकर भी आपको दुःख नहीं होता। हाय, ग़रीब वाजिदअली शाह!

मीर––पहले अपने बादशाह को तो बचाइए, फिर जवान-साहब का मातम कीजिएगा। यह किश्त और मात। लाना हाथ!

बादशाह को लिये हुए सेना समाने से निकल गयी। उनके जाते ही मिर्जा ने फिर बाज़ी बिछा दी। हार की चोट बुरी होती है। मीर ने कहा––आइए, नवाब साहब के मातम में एक मरसिया कह डालें। लेकिन मिर्जाजी की राजभक्ति, अपनी हार के साथ लुप्त हो चुकी थी, वह हार का बदला चुकाने के लिए अधीर हो रहे थे।

शाम हो गयी। खँडहर में चमगादड़ों ने चीख़ना शुरू किया। अजा-बीलें आ-आकर अपने-अपने घोसलों में चिमटीं। पर दोनों खिलाड़ी हटे हुए थे, मानों दो खून के प्यासे सूरमा आपस में लड़ रहे हों। ​तीन बाजियाँ लगातार हार चुके थे; इस चौथी बाजी का रंग भी अच्छा न था। वह बार-बार जीतने का दृढ़ निश्चय कर सँभलकर खेलते थे; लेकिन एक-न-एक चाल ऐसी बेढब आ पड़ती थी, जिससे बाज़ी खराब हो जाती था। हर बार हार के साथ प्रतिकार की भावना और भी उग्र होती जाती थी। उधर मीर साहब मारे उमंग के ग़ज़लें गाते थे, चुटकियाँ लेते थे, मानों कोई गुप्त धन'पा गये हों। मिर्जाजी सुन-सुनकर झुँझलाते और हार की झेंप मिटाने के लिए उनकी दाद देते थे। पर ज्यों-ज्यों बाज़ी कमजोर बढ़ती थी, धैर्य-हाथ से निकलता जाता था। यहाँ तक कि वह बात-बात पर झुँझलाने लगे––जनाब, आप चाल न बदला कीजिए। यह क्या कि एक चाल चले और फिर उसे बदल दिया। जो कुछ चलना हो एक बार चल दीजिए। यह आप मुहरे पर ही क्यों हाथ रखे रहते हैं। मुहरे को छोड़ दीजिए। जब तक आपको चाल न सूझे, मुहरा छुइए ही नहीं। आप एक-एक चाल आध-आध घण्टे में चलते हैं। इसकी सनद नहीं जिसे एक चाल चलने में पांच मिनट से ज्यादा लगे, उसकी मात समझी जाय। फिर आपने चाल बदली! चुपके से मुहरा वहीं रख दीजिए।

मीर साहब का फ़रजी पिटता था। बोले––मैने चाल चली ही कब थी,

मिर्जा––आप चाल चल चुके हैं। मुहरा वहीं रख दीजिए––उसी घर में।

मीर––उस घर में क्यों रखूँ? हाथ से मुहरा छोड़ा कब था? मिर्जा––मुहरा आप क़यामत तक न छोड़ें, तो क्या चाल ही न होगी? फ़रजी पिटते देखा तो धाँधली करने लगे!

मीरा––धाँधली आप करते हैं। हार-जीत तक़दीर से होती है। धाँधली से कोई नहीं जीतता। ​मीर––मुझे क्यों मात होने लगी।

मिर्जा––तो आप मुहरा उसी घर में रख दीजिए, जहाँ पहले रखा था।

तकरार बढ़ने लगी। दोनों अपनी-अपनी टेक पर अड़े थे। न यह दबता था न वह। अप्रासंगिक बातें होने लगीं। मिर्जा बोले––किसी ने खानदान में शतरंज खेली होती, तब तो इसके कायदे जानते। वे तो हमेशा घास छीला किये, आप शतरंज क्या खेलिएगा। रियासत और ही चीज़ है। जागीर मिल जाने ही से कोई रईस नहीं हो जाता।

मीर––क्या! घास आपके अब्बाजान छोलते होंगे! यहाँ तो पीढ़ियों से शतरंज खेलते चले आते हैं।

मिर्जा––अज़ी जाइए भी, ग़ाज़ीउद्दीन हैदर के यहाँ बावच का काम करते-करते उम्र गुज़र गयी, आज रईस बनने चले हैं। रईस बनना कुछ दिल्लगी नहीं।

मीर––क्यों अपने बुजुर्गों के मुँह में कालिख लगाते हो––वे ही बावर्ची का काम करते होंगे। यहाँ तो हमेशा बादशाह दस्तरख्वान पर खाना खाते चले आये हैं।

मिर्जा––अरे चल चरकटे, बहुत बढ़-चढ़कर बातें न कर!

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