मीर––जबान संभालिए, वर्ना बुरा होगा। मैं ऐसी बातें सुनने का आदी नहीं हूँ; यहाँ तो किसी ने आँखें दिखायीं कि उसकी आँखें निकालीं। है हौसला?
मिर्ज़ा––पाप मेरा हौसला देखना चाहते हैं, तो फिर आइए, आज दो-दो हाथ हो जायँ, इधर या उधर।
मीर––तो यहाँ तुमसे दबनेवाला कौन है? ​दोनों दोस्तों ने कमर से तलवारें निकाल ली। नबाबी ज़माना था; सभी तलवार, पेशक़ब्ज, कटार वगैरह बाँधते थे। दोनों विलासी थे; पर कायर न थे। उनमें राजनीतिक भावों का अधःपतन हो गया था। बादशाहत के लिए क्यों मरें? पर व्यक्तिगत वीरता का अभाव न था। दोनों ने पैंतरे बदले, तलवारें चमकीं, छपाछप की आवाजें आयीं। दोनों जख्मी होकर गिरे और दोनों में वहीं तड़प-तड़पकर जानें दीं। अपने बादशाह के लिए जिनकी आँखों से एक बूॅद आँसू न निकला, उन्हीं ने शतरंज के वजीर की रक्षा में प्राण दे दिये।
अँधेरा हो चला था। बाज़ी बिछी हुई थी। दोनों बादशाह अपने-अपने सिंहासनों पर बैठे मानो इन दोनों वीरों की मृत्यु पर रो रहे थे।
चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। खँडहर की टूटी हुई मेहराबें, गिरी हुई दीवारें और धूल-धूसरित मीनारें इन लाशों को देखतीं और सिर धुनती थीं।