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एक ही खेत में फ़सल भी, बिजली भी: एग्रीवोल्टाइक्स क्या है और भारत के किसानों के लिए क्यों अहम है

हरे-भरे खेतों के बीच घास वाली ज़मीन पर लगी सोलर पैनलों की एक लंबी कतार
Photo: “Photovoltaic Panels Reap Solar Energy on Farms (20240809-USDA-RD-DCK-0329)” by USDAgov · Public domain · via Wikimedia Commons

In brief

प्रेस इन्फ़ॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) ने 23 अक्टूबर 2026 को एग्रीवोल्टाइक्स पर एक विस्तृत जानकारी जारी की। इस तकनीक में सोलर पैनल ऊँचे ढाँचों पर या फ़सल की कतारों के बीच लगाए जाते हैं, ताकि नीचे खेती चलती रहे और ऊपर बिजली बने। PIB के अनुसार अगस्त 2025 तक भारत में 37.54 मेगावाट क्षमता वाली 36 एग्रीवोल्टाइक परियोजनाएँ चालू थीं और 10 प्रायोगिक परियोजनाएँ तैयार हो रही थीं। नई दिल्ली में 21 से 23 अक्टूबर तक 7वाँ एग्रीवोल्टाइक्स विश्व सम्मेलन भी हुआ, जिसका विषय "पावरिंग द ग्लोबल साउथ" रखा गया।

यह तकनीक काम कैसे करती है

आम सोलर फ़ार्म में पैनल सीधे ज़मीन पर लगते हैं और वह ज़मीन खेती के काम की नहीं रहती। एग्रीवोल्टाइक्स, जिसे एग्रीसोलर या दोहरे इस्तेमाल वाला सोलर भी कहते हैं, में पैनल इतनी ऊँचाई पर लगाए जाते हैं कि धूप और बारिश नीचे की फ़सल तक पहुँचती रहे और किसान अपने कृषि उपकरण आराम से नीचे ले जा सकें। पैनलों की आंशिक छाया फ़सल को तेज़ गर्मी से बचाती है और मिट्टी से पानी का वाष्पीकरण कम करती है, जो गर्म और सूखे इलाक़ों में ख़ास तौर पर मददगार है। बनने वाली बिजली से सिंचाई पंप चल सकते हैं और बची हुई बिजली ग्रिड को बेचकर अतिरिक्त कमाई हो सकती है।

भारत में कितनी संभावना है

PIB के मुताबिक़ देश में एग्रीवोल्टाइक्स की अनुमानित क्षमता 3,000 गीगावाट से लेकर लगभग 14,000 गीगावाट तक है। GIS आधारित राष्ट्रीय जाँच में 47.35 मिलियन हेक्टेयर ज़मीन इसके लिए उपयुक्त पाई गई है। महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में इसकी सबसे ज़्यादा संभावना बताई गई है, और कुल अनुमानित उत्पादन का लगभग आधा इन्हीं राज्यों से आ सकता है। फल, सब्ज़ियाँ, मसाले और औषधीय पौधे पैनलों के साथ उगाने के अच्छे विकल्प माने गए हैं। PIB के अनुसार कुछ मामलों में किसानों की सालाना कमाई लगभग 60,000 रुपये प्रति एकड़ से बढ़कर 1 लाख रुपये प्रति एकड़ से ज़्यादा हो सकती है।

सरकार क्या कर रही है

फ़रवरी 2019 में शुरू हुई पीएम-कुसुम योजना खेती में सौर ऊर्जा और सोलर पंपों को बढ़ावा देती है, जिसमें लगभग 34,422 करोड़ रुपये की केंद्रीय वित्तीय सहायता का प्रावधान है। राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान ने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के साथ मिलकर एग्रीवोल्टाइक्स पर एक उत्कृष्टता केंद्र बनाया है, जहाँ 100 किलोवाट का प्रायोगिक सिस्टम भी लगा है। महाराष्ट्र जैसे राज्य अपनी योजनाओं से खेती के लिए सौर बिजली को आगे बढ़ा रहे हैं।

VSH की राय: यह विचार सीधा है: जो ज़मीन अभी सिर्फ़ फ़सल देती है, वह बिजली भी दे। फ़ायदा तभी होगा जब फ़सल सही चुनी जाए, क्योंकि हर पौधा छाया में अच्छा नहीं उगता, और पैनलों की ऊँचाई और दूरी स्थानीय हालात के हिसाब से तय हो। जो किसान सोच रहे हैं, उनके लिए पहला क़दम पीएम-कुसुम और अपने राज्य की योजना की आधिकारिक जानकारी पढ़ना है। खेत का क्षेत्रफल एकड़ से हेक्टेयर में बदलना हो तो हमारा यूनिट कन्वर्टर और दिन में धूप के घंटे देखने के लिए सूर्योदय-सूर्यास्त टूल काम आएगा।

ViralScopeHub एक स्वतंत्र समाचार सारांश साइट है और भारत सरकार, PIB या किसी मंत्रालय से संबद्ध नहीं है। योजनाओं की पात्रता और आवेदन के लिए केवल आधिकारिक सरकारी वेबसाइट देखें।

Why it matters

भारत की लगभग 46 प्रतिशत आबादी की आजीविका खेती पर टिकी है; एक ही ज़मीन से फ़सल और बिजली दोनों मिलें तो किसानों की आय और देश की स्वच्छ ऊर्जा, दोनों को फ़ायदा हो सकता है।

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एग्रीवोल्टाइक्स क्या है?

एक ही ज़मीन पर फ़सल उगाने और सोलर बिजली बनाने की तकनीक। पैनल ऊँचे ढाँचों पर या फ़सल की कतारों के बीच लगाए जाते हैं ताकि नीचे खेती चलती रहे।

भारत में कितनी एग्रीवोल्टाइक परियोजनाएँ हैं?

PIB के अनुसार अगस्त 2025 तक 37.54 मेगावाट क्षमता वाली 36 परियोजनाएँ चालू थीं और 10 प्रायोगिक परियोजनाएँ विकास के चरण में थीं।

किसानों को इससे क्या फ़ायदा है?

सिंचाई के लिए सस्ती बिजली, डीज़ल पंप पर कम निर्भरता, ग्रिड को बिजली बेचकर अतिरिक्त आय, और पैनलों की छाया से मिट्टी में नमी बनी रहना।

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Sources

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